कुछ ऐसे हो परीक्षा की तैयारी
समय प्रबंधन के लिए पुराने प्रश्न पत्रों को हल करना हो सकता है कारगर
हर प्रकार के विद्यार्थी जीवन में मार्च माह से लेकर अप्रैल और मई माह तक का समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। वैसे तो विद्यार्थी जीवन विद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन सत्र शुरू होने के साथ ही अपने भविष्य के प्रति सचेतता से जुड़ जाना चाहिए। वर्तमान युग कुछ ऐसे परिवर्तनों से होकर गुजर रहा है, जिसमें समाज का हर वर्ग अवसरों का आनंद उठाना चाहता है। यही कारण है कि विद्यार्थी वर्ग भी जुलाई माह से लेकर दिसंबर तक मौजमस्ती में समय गंवा बैठते है। जैसे ही नया साल परवान चढ़ता है, शिक्षा से जुड़े विद्यार्थी अपनी परीक्षा के प्रति चिंतित दिखाई पड़ने लगते है। वर्ष के महत्वपूर्ण समय को गंवा देने के बाद बचे चंद महिनों में अच्छी पढ़ाई कर अंक पाने की चिंता उन्हें विषय से सही रूप में नहीं जोड़ पाती है। घबराहट में परीक्षा कक्ष तक पहुंचना और मन में प्रश् पत्र को लेकर उठ रहे नकारात्मक विचारों के चलते सामान्यत: विद्यार्थी अपनी कौशल क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते है। साथ ही उन्हें पारिवारिक सदस्यों के बीच ढाढस बंधाने वाले शख्स की कमी भी बड़ी भूमिका का निर्वहन करती है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ी दिक्कत का सामना कक्षा 10वीं और 12वीं के विद्यार्थी करते दिखाई पड़ते है। कारण यह है कि एक तो उम्र की चंचलता और दूसरा भविष्य के प्रति सचेतता की कमी उन्हें वक्त का एहसास नहीं करा पाती है। मार्च की पहली तारीख से ही बोर्ड की परीक्षाएं शुरूआती रूप लेगी। हम अपने विद्यार्थियों को इन्हीं परीक्षाओं में भयमुक्त माहौल के साथ तैयारी के कुछ गुर बताने का प्रयास कर रहे है। संभवत: हमारे बताए गए तैयारी के बिंदू अपनाएं भी जा रहे होंगे। फिर भी परीक्षा का भूत भगाने हमारा प्रयास शायद सार्थक हो सकें।
पाठयक्रम पर आधारित अंकों के अनुसार हो पढ़ाई
विद्यार्थियों को सर्वप्रथम अपना ध्यान सभी विषयों के पाठयक्रम पर लगाना चाहिए। इस बात पर बारीकी से विचार करना चाहिए कि किस अध्याय से कितने अंकों का प्रश् पूछा जाना है। आजकल बोर्ड परीक्षा से पूर्व प्रत्येक बोर्ड चाहे वह सीबीएसई हो या आईसीएससी अथवा प्रदेश सरकार का बोर्ड हो,विद्यार्थियों की सुविधा के लिए ब्लूप्रिंट जारी करता आ रहा है। इस पर भी सावधानी जरूरी जान पड़ती है कि बाजार में उपलब्ध प्रश् बैंकों पर दिए गए ब्लूप्रिंट को एक बार बोर्ड की वेबसाईट खोलकर मिलान अवश्य कर ले और अंतिम रूप से बोर्ड की वेबसाईट के ब्लूप्रिंट को ही स्वीकार करें। ऐसा करने से अध्याय की महत्ता और उस पर लगाया जाने वाला अध्ययन का समय उचित रूप से बांटा जा सकता है। जिस अध्याय से महज दो अंकों का प्रश् पूछा जाना हो उस अध्याय के बड़े प्रश्ों को याद करने का अनुपयोगी समय भी सकारात्मक परिणाम की ओर अग्रसर कर सकेगा। साथ ही इस बात की जानकारी भी सहज रूप में उपलब्ध हो पाएगी कि किस इकाई से वस्तुनिष्ठ प्रश् पूछे जाने है और कौन सी इकाई बड़े प्रश्ों के लिए आरक्षित रखी गई है। इस प्रकार से विद्यार्थी अपनी योजना को प्रथम पायदान के रूप में उचित दिशा प्रदान कर सकेंगे।
किसी भी विषय को हल्के में न लें
प्राय: देखा गया है कि हिन्दी माध्यम शालाओं में अध्ययन करने वाले विद्यार्थी हिन्दी विषय को कमतर आकते हुए उस पर वर्षभर ध्यान नहीं देते है और हल्के में लेते हुए विषय के शिक्षक को भी कक्षाओं में उतनी गंभीरता से नहीं लेते जितनी जरूरत है। कमोवेश ऐसी ही स्थिति का नजारा अंग्रेजी माध्यम शालाओं के विद्यार्थियों में भी दिखाई पड़ रही है। जो अपने अंग्रेजी विषय के व्याख्याता को गंभीरता से नहीं लेते है। इन दोनों विषयों की पढ़ाई भी विद्यार्थीगण सालभर लगभग नहीं करते है। सोचते है कि यह विषय तो बढ़ा आसान है, इसे कभी कभी तैयार कर लेंगे। जहां तक मैं समझता हूं हिंदी माध्यम के विद्यार्थी अंग्रेजी विषय को पहाड़ मानते हुये कठिनाई से जोड़ कर देखते है। भय के चलते पेपर बिगाड़ भी बैठते है। वास्तव में देखा जाये तो ऐसा नहीं है। विद्यार्थियों को सामान्य अंग्रेजी के प्रश्न पत्र के लिये आर्टिकल, प्रीप्रोजिशन के साथ ऐशे और लेटर राईटिंग पर यादा ध्यान देना चाहिये। कारण यह कि प्रश्न पत्र के इस भाग में काफी नंबर आधारित होते है। साथ ही कक्षा में विषय शिक्षक द्वारा दिये गये नोट्स को हल्के में न लेते हुये उनका अध्ययन गंभीरता पूर्वक करना चाहिये। प्रश्न और उत्तर वाले खंड में कमी के अभाव में बाजार में उपलब्ध गाईड का सहारा भी लिया जा सकता है। इसी तरह अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी हिंदी विषय पर अन्य विषयों की तरह गंभीरता दिखाये तो अच्छे परिणाम मिल सकते है। विगत कुछ वर्षों से यह देखने में आ रहा है कि अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी विषय में पीछे हो रहे है, तो हिंदी माध्यम के विद्यार्थी भी हिंदी विषय में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे है।
सैध्दांतिक और प्रायोगिक दोनों प्रश्नों पर हो गंभीर
एक विशेष बात जो ध्यान में रखी जानी चाहिये वह यह कि सैध्दांतिक और प्रायोगिक प्रश्नों से भरपूर विषय में दोनों खंडों पर विद्यार्थी गंभीर रहे। प्राय: विद्यार्थी प्रायोगिक खंड से भागते हुये बड़े अंकों का नुकसान कर बैठते है। मिसाल के तौर पर वाणिय संकाय के विद्यार्थी एकाउंटेंसी विषय पर घबराते हुये उसके सैध्दांतिक प्रश्नों पर आधारित होकर परीक्षा कक्ष में पहुंचते है और प्रायोगिक प्रश्नों को छोड़कर अपनी श्रेणी बिगाड़ बैठते है। कुछ ऐसी ही कहानी विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों के साथ भी देखी जा रही है। रासायन शास्त्र और भौतिक शास्त्र के संख्यात्मक खंड को छोड़ देने की प्रवृत्ति उन्हें सफलता के दायरे से दूर रख रही है। मैं विशेष रूप से बात करना चाहता हूं वाणिय संकाय के विद्यार्थियों की, उन्हें एकाउंटेंसी की पंजी प्रवृष्टियों के नियम ध्यान में रखते हुये प्रश्न हल करने चाहिये। सावधानी के तौर पर पिछले वर्षों के प्रश्न पत्रों को हल करते हुये समय प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिये। साथ ही शालाओं में होने वाली प्री बोर्ड परीक्षा को हल्के में न लेकर उसमें अवश्य शामिल होना चाहिये। इस प्रकार की परीक्षा जहां समय प्रबंधन के लिये उचित होती है, वहीं परीक्षा के भय को समाप्त कर हौसला प्रदान करती है और सेल्फ कॉन्फिडेंश के विचार के साथ परीक्षा कक्ष में प्रवेश सफलता का सूचक होता है। सैध्दांतिक प्रश्नों की तैयारी रटंत प्रक्रिया से दूर समझने की रीति द्वारा की जानी चाहिये। आप जिस विषय के थ्योरी प्रश्न को पढ़ रहे हो, पहले उसके अर्थ को भली भांति जान लें, और फिर उसके उद्देश्य, महत्व, विशेषता पर ध्यान रखते हुये अपने शब्दों में लिखने का प्रयास करें। इस संबंध में एक बात जरूर ध्यान में रखें कि उत्तरों के बिंदू सटिक रूप में याद हो और उनकी व्याख्या विषय से बाहर न हो।
सभी अध्याय के प्रश्नों को क्रमवार पढ़ें
आप किसी भी विषय के विद्यार्थी हो इस बात पर गौर फरमायें कि उस वर्ग के सभी विषयों के अध्याय के अनुसार समय का निर्धारण कर प्रत्येक खंड से प्रश्नों को हल करें। किसी एक अध्याय के लगातार 25-30 प्रश्नों को हल करना और अन्य अध्याय को पूरा छोड़ उसे दूसरे दिन और फिर इसी प्रकार पढ़ने का क्रम वास्तव में अनुचित अध्ययन प्रक्रिया है। मैं पुन: कॉमर्स विषय के विद्यार्थियों को सावधान करते हुये कहना चाहूंगा कि एकमात्र एकाउंटेंसी विषय की तैयारी सभी अध्यायों को समेट कर करें। मसलन एक दिन की लगभग दो घंटे की तैयारी बैठक में अवक्षयण से लेकर प्रेषण व्यवहार, गैर व्यापारिक संस्थान के लेखे, साझेदारी, संयुक्त उपक्रम और कंपनी लेखों में से कम से कम एक एक प्रश्न एक के बाद एक हल करने का प्रयास करें। ऐसा करने से परीक्षा प्रश्न पत्र को हल करने की तरह रोज प्रयास होते रहने से आत्मबल में वृध्दि होगी और सफलता का ग्राफ ऊंचाई पा सकेगा। इसी तरह अन्य वर्ग के विद्यार्थी भी अपने अध्यायों को विभक्त कर उचित रूप में पढ़ाई कर सकते है।
लंबे समय की बैठक के बजाए बीच में अंतराल लें
पढ़ाई और परीक्षा तैयारी की उब से बचने के लिये विद्यार्थियों को लंबे समय की तैयारी बैठक में परितर्वन लाते हुये बीच बीच में अंतराल की प्रक्रिया प्रयोग में लानी चाहिये। इस मामले में यह ध्यान रखना जरूरी है कि अंतराल कम से कम 40 मिनट बाद ही हो, और उस दौरान अपने दिमाग को आराम देने अपना पसंदीदा काम किया जाये, जैसे बांसूरी वादन, टीवी पर गाने का सुनना या फिर छोटे हंसी मजाक सेभरपूर कार्यक्रम देखना। अब यह भी ध्यान रखना होगा कि हम अंतराल के समय को 15 मिनट से अधिक न रखें। दिमाग के तंतुओं को आराम का अहसास होने के बाद फिर से 40 मिनट की गंभीरतापूर्ण तैयारी से जुड़ जाये। यहां विशेष उल्लेखनीय सुझाव यह है कि प्रायोगिक विषयों की तैयारी में अंतराल तभी लें जब बनाया जा रहा गणित अथवा एकाउंट का प्रश्न हल हो चुका हो। अधुरे प्रश्न को बाद में पूरा कर लेने की सोच फिर से उतना ही समय बर्बाद कर सकती है। छोटे मोटे जोड़ घटाव वाले प्रश्नों पर आने वाली दिक्कतों का सामना करने के लिये मन में जोड़ घटाव खाली समय में करते रहना चाहिये। इस मामले में पजल्स खेल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है, जैसे रंगों को सेट करने वाला चौकोर दिमागी खेल।
कुछ अति महत्वपूर्ण बिंदुओं पर रखे ध्यान
परीक्षा की तैयारी के लिये कुछ अति महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान रखना जरूरी है। संक्षिप्त वे कुछ इस प्रकार हो सकते है।
1. टाईम टेबल के अनुसार करें पढ़ाई।
2. कठिन लगने वाले विषयों को बहुत सबेरे के शांत वातावरण में पढ़े।
3. जहां पढ़ाई कर रहे हों उस कमरे का वातावरण शुध्दता से पूर्ण हो।
4. पढ़ाई के लिये बैठने से पूर्व हल्का और सुपाच्य भोजन अवश्य लें।
5. गणितीय विषयों के सूत्रों का चार्ट टेबल के सम्मुख लगाकर रखें।
6. मन को भ्रमित करने वाले प्रश्नों को अलग निकालकर शिक्षकों से मार्गदर्शन लें।
7. सैध्दांतिक प्रश्नों का उत्तर लिखते समय मूल्यांकनकर्ता को जीतने विशेष रूप से बिंदुओं को रेखांकित अवश्य करें।
8. प्रश्न के उत्तरों को बिंदुवार याद कर बार-बार लिखें। जिससे आत्मबल बढ़ेगा।
9. परीक्षा कक्ष में प्रवेश करते समय नकारात्मक विचारों का त्याग करें और जिन प्रश्नों को नहीं पढ़ा गया है उनके बारे में बिल्कुल न सोंचे।
10. आपके द्वारा पढ़े गये प्रश्नों का उत्तर आसानी से लिखा जा सकता है, इस विचार के साथ अपने रोल नंबर वाली जगह पर बैठे।
11. मन को विचलित करने वाली बातें करने वाले दोस्तों से दूर रहे, हो सके तो परीक्षा तक उनसे संबंध न रखें।
ध्यान रखें न हो ये गलतियां
विशेषकर कॉमर्स संकाय के विद्यार्थी एकाउंटेंसी का प्रश्न हल करते समय इन छोटी छोटी बातों का विशेष ध्यान रखें। साझेदारी से लेकर गैर व्यापारिक संस्थाओं और अवक्षयण अथवा मूल्य ह्ास के प्रश्नों को जल्दबाजी में हल न करें। अवक्षयण के प्रश्न पर दी गयी विधि के साथ मूल्य ह्ास की दर एवं प्रतिवर्ष शब्द का महत्व ध्यान में रखें। यह भी ध्यान में रखें कि इस शब्द का महत्व घटती किश्त पध्दति में महत्वपूर्ण है, जबकि स्थायी किश्त पध्दति में इसे सर्वथा दिया जाना माना जाता है। इसी तरह गैर व्यापारिक संस्थाओं की प्रारंभिक पूंजी ज्ञात करते समय प्रारंभिक संपत्ति और प्रारंभिक देयताओं की जानकारी जरूरी है। अत: विद्यार्थी उदाहरण के प्रश्नों को छोटा मानकर उसे नजर अंदाज न करें। साझेदारी अध्याय इस मामले में कुछ पेचीदा हो सकता है। कारण यह कि यह पूरे विषय के लगभग 40 प्रतिशत पाठयक्रम के बराबर है। सामान्य साझेदारी से लेकर नये साझेदार का प्रवेश, उसका अवकाश ग्रहण और संस्था के समापन पर ख्याति का मूल्यांकन विशेष गणितीय भाग से जुड़ा हुआ है। मूल्यांकन से लेकर ख्याति के अपलेखन तक विधियों को दिमाग में बैठाने छोटे-छोटे दिये गये उदाहरणों को अवश्य हल करें। साथ ही इन सारी परिस्थितियों में लाभ विभाजन के अनुपात में आने वाला परिवर्तन भी अलग अलग विधियों के कारण विद्यार्थी जगत को परेशान करता आ रहा है। इन्हें सही ढंग से समझने में शिक्षक की भूमिका की अनदेखी न की जाये। कक्षा में शिक्षक द्वारा समझाये जाने पर उचित ध्यान और फिर प्रश्नोत्तर खंड में दिये ऐसे प्रश्नों का अभ्यास नितांत जरूरी समझा जाना चाहिये।
हर प्रकार के विद्यार्थी जीवन में मार्च माह से लेकर अप्रैल और मई माह तक का समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। वैसे तो विद्यार्थी जीवन विद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन सत्र शुरू होने के साथ ही अपने भविष्य के प्रति सचेतता से जुड़ जाना चाहिए। वर्तमान युग कुछ ऐसे परिवर्तनों से होकर गुजर रहा है, जिसमें समाज का हर वर्ग अवसरों का आनंद उठाना चाहता है। यही कारण है कि विद्यार्थी वर्ग भी जुलाई माह से लेकर दिसंबर तक मौजमस्ती में समय गंवा बैठते है। जैसे ही नया साल परवान चढ़ता है, शिक्षा से जुड़े विद्यार्थी अपनी परीक्षा के प्रति चिंतित दिखाई पड़ने लगते है। वर्ष के महत्वपूर्ण समय को गंवा देने के बाद बचे चंद महिनों में अच्छी पढ़ाई कर अंक पाने की चिंता उन्हें विषय से सही रूप में नहीं जोड़ पाती है। घबराहट में परीक्षा कक्ष तक पहुंचना और मन में प्रश् पत्र को लेकर उठ रहे नकारात्मक विचारों के चलते सामान्यत: विद्यार्थी अपनी कौशल क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते है। साथ ही उन्हें पारिवारिक सदस्यों के बीच ढाढस बंधाने वाले शख्स की कमी भी बड़ी भूमिका का निर्वहन करती है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ी दिक्कत का सामना कक्षा 10वीं और 12वीं के विद्यार्थी करते दिखाई पड़ते है। कारण यह है कि एक तो उम्र की चंचलता और दूसरा भविष्य के प्रति सचेतता की कमी उन्हें वक्त का एहसास नहीं करा पाती है। मार्च की पहली तारीख से ही बोर्ड की परीक्षाएं शुरूआती रूप लेगी। हम अपने विद्यार्थियों को इन्हीं परीक्षाओं में भयमुक्त माहौल के साथ तैयारी के कुछ गुर बताने का प्रयास कर रहे है। संभवत: हमारे बताए गए तैयारी के बिंदू अपनाएं भी जा रहे होंगे। फिर भी परीक्षा का भूत भगाने हमारा प्रयास शायद सार्थक हो सकें।
पाठयक्रम पर आधारित अंकों के अनुसार हो पढ़ाई
विद्यार्थियों को सर्वप्रथम अपना ध्यान सभी विषयों के पाठयक्रम पर लगाना चाहिए। इस बात पर बारीकी से विचार करना चाहिए कि किस अध्याय से कितने अंकों का प्रश् पूछा जाना है। आजकल बोर्ड परीक्षा से पूर्व प्रत्येक बोर्ड चाहे वह सीबीएसई हो या आईसीएससी अथवा प्रदेश सरकार का बोर्ड हो,विद्यार्थियों की सुविधा के लिए ब्लूप्रिंट जारी करता आ रहा है। इस पर भी सावधानी जरूरी जान पड़ती है कि बाजार में उपलब्ध प्रश् बैंकों पर दिए गए ब्लूप्रिंट को एक बार बोर्ड की वेबसाईट खोलकर मिलान अवश्य कर ले और अंतिम रूप से बोर्ड की वेबसाईट के ब्लूप्रिंट को ही स्वीकार करें। ऐसा करने से अध्याय की महत्ता और उस पर लगाया जाने वाला अध्ययन का समय उचित रूप से बांटा जा सकता है। जिस अध्याय से महज दो अंकों का प्रश् पूछा जाना हो उस अध्याय के बड़े प्रश्ों को याद करने का अनुपयोगी समय भी सकारात्मक परिणाम की ओर अग्रसर कर सकेगा। साथ ही इस बात की जानकारी भी सहज रूप में उपलब्ध हो पाएगी कि किस इकाई से वस्तुनिष्ठ प्रश् पूछे जाने है और कौन सी इकाई बड़े प्रश्ों के लिए आरक्षित रखी गई है। इस प्रकार से विद्यार्थी अपनी योजना को प्रथम पायदान के रूप में उचित दिशा प्रदान कर सकेंगे।
किसी भी विषय को हल्के में न लें
प्राय: देखा गया है कि हिन्दी माध्यम शालाओं में अध्ययन करने वाले विद्यार्थी हिन्दी विषय को कमतर आकते हुए उस पर वर्षभर ध्यान नहीं देते है और हल्के में लेते हुए विषय के शिक्षक को भी कक्षाओं में उतनी गंभीरता से नहीं लेते जितनी जरूरत है। कमोवेश ऐसी ही स्थिति का नजारा अंग्रेजी माध्यम शालाओं के विद्यार्थियों में भी दिखाई पड़ रही है। जो अपने अंग्रेजी विषय के व्याख्याता को गंभीरता से नहीं लेते है। इन दोनों विषयों की पढ़ाई भी विद्यार्थीगण सालभर लगभग नहीं करते है। सोचते है कि यह विषय तो बढ़ा आसान है, इसे कभी कभी तैयार कर लेंगे। जहां तक मैं समझता हूं हिंदी माध्यम के विद्यार्थी अंग्रेजी विषय को पहाड़ मानते हुये कठिनाई से जोड़ कर देखते है। भय के चलते पेपर बिगाड़ भी बैठते है। वास्तव में देखा जाये तो ऐसा नहीं है। विद्यार्थियों को सामान्य अंग्रेजी के प्रश्न पत्र के लिये आर्टिकल, प्रीप्रोजिशन के साथ ऐशे और लेटर राईटिंग पर यादा ध्यान देना चाहिये। कारण यह कि प्रश्न पत्र के इस भाग में काफी नंबर आधारित होते है। साथ ही कक्षा में विषय शिक्षक द्वारा दिये गये नोट्स को हल्के में न लेते हुये उनका अध्ययन गंभीरता पूर्वक करना चाहिये। प्रश्न और उत्तर वाले खंड में कमी के अभाव में बाजार में उपलब्ध गाईड का सहारा भी लिया जा सकता है। इसी तरह अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी हिंदी विषय पर अन्य विषयों की तरह गंभीरता दिखाये तो अच्छे परिणाम मिल सकते है। विगत कुछ वर्षों से यह देखने में आ रहा है कि अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी विषय में पीछे हो रहे है, तो हिंदी माध्यम के विद्यार्थी भी हिंदी विषय में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे है।
सैध्दांतिक और प्रायोगिक दोनों प्रश्नों पर हो गंभीर
एक विशेष बात जो ध्यान में रखी जानी चाहिये वह यह कि सैध्दांतिक और प्रायोगिक प्रश्नों से भरपूर विषय में दोनों खंडों पर विद्यार्थी गंभीर रहे। प्राय: विद्यार्थी प्रायोगिक खंड से भागते हुये बड़े अंकों का नुकसान कर बैठते है। मिसाल के तौर पर वाणिय संकाय के विद्यार्थी एकाउंटेंसी विषय पर घबराते हुये उसके सैध्दांतिक प्रश्नों पर आधारित होकर परीक्षा कक्ष में पहुंचते है और प्रायोगिक प्रश्नों को छोड़कर अपनी श्रेणी बिगाड़ बैठते है। कुछ ऐसी ही कहानी विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों के साथ भी देखी जा रही है। रासायन शास्त्र और भौतिक शास्त्र के संख्यात्मक खंड को छोड़ देने की प्रवृत्ति उन्हें सफलता के दायरे से दूर रख रही है। मैं विशेष रूप से बात करना चाहता हूं वाणिय संकाय के विद्यार्थियों की, उन्हें एकाउंटेंसी की पंजी प्रवृष्टियों के नियम ध्यान में रखते हुये प्रश्न हल करने चाहिये। सावधानी के तौर पर पिछले वर्षों के प्रश्न पत्रों को हल करते हुये समय प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिये। साथ ही शालाओं में होने वाली प्री बोर्ड परीक्षा को हल्के में न लेकर उसमें अवश्य शामिल होना चाहिये। इस प्रकार की परीक्षा जहां समय प्रबंधन के लिये उचित होती है, वहीं परीक्षा के भय को समाप्त कर हौसला प्रदान करती है और सेल्फ कॉन्फिडेंश के विचार के साथ परीक्षा कक्ष में प्रवेश सफलता का सूचक होता है। सैध्दांतिक प्रश्नों की तैयारी रटंत प्रक्रिया से दूर समझने की रीति द्वारा की जानी चाहिये। आप जिस विषय के थ्योरी प्रश्न को पढ़ रहे हो, पहले उसके अर्थ को भली भांति जान लें, और फिर उसके उद्देश्य, महत्व, विशेषता पर ध्यान रखते हुये अपने शब्दों में लिखने का प्रयास करें। इस संबंध में एक बात जरूर ध्यान में रखें कि उत्तरों के बिंदू सटिक रूप में याद हो और उनकी व्याख्या विषय से बाहर न हो।
सभी अध्याय के प्रश्नों को क्रमवार पढ़ें
आप किसी भी विषय के विद्यार्थी हो इस बात पर गौर फरमायें कि उस वर्ग के सभी विषयों के अध्याय के अनुसार समय का निर्धारण कर प्रत्येक खंड से प्रश्नों को हल करें। किसी एक अध्याय के लगातार 25-30 प्रश्नों को हल करना और अन्य अध्याय को पूरा छोड़ उसे दूसरे दिन और फिर इसी प्रकार पढ़ने का क्रम वास्तव में अनुचित अध्ययन प्रक्रिया है। मैं पुन: कॉमर्स विषय के विद्यार्थियों को सावधान करते हुये कहना चाहूंगा कि एकमात्र एकाउंटेंसी विषय की तैयारी सभी अध्यायों को समेट कर करें। मसलन एक दिन की लगभग दो घंटे की तैयारी बैठक में अवक्षयण से लेकर प्रेषण व्यवहार, गैर व्यापारिक संस्थान के लेखे, साझेदारी, संयुक्त उपक्रम और कंपनी लेखों में से कम से कम एक एक प्रश्न एक के बाद एक हल करने का प्रयास करें। ऐसा करने से परीक्षा प्रश्न पत्र को हल करने की तरह रोज प्रयास होते रहने से आत्मबल में वृध्दि होगी और सफलता का ग्राफ ऊंचाई पा सकेगा। इसी तरह अन्य वर्ग के विद्यार्थी भी अपने अध्यायों को विभक्त कर उचित रूप में पढ़ाई कर सकते है।
लंबे समय की बैठक के बजाए बीच में अंतराल लें
पढ़ाई और परीक्षा तैयारी की उब से बचने के लिये विद्यार्थियों को लंबे समय की तैयारी बैठक में परितर्वन लाते हुये बीच बीच में अंतराल की प्रक्रिया प्रयोग में लानी चाहिये। इस मामले में यह ध्यान रखना जरूरी है कि अंतराल कम से कम 40 मिनट बाद ही हो, और उस दौरान अपने दिमाग को आराम देने अपना पसंदीदा काम किया जाये, जैसे बांसूरी वादन, टीवी पर गाने का सुनना या फिर छोटे हंसी मजाक सेभरपूर कार्यक्रम देखना। अब यह भी ध्यान रखना होगा कि हम अंतराल के समय को 15 मिनट से अधिक न रखें। दिमाग के तंतुओं को आराम का अहसास होने के बाद फिर से 40 मिनट की गंभीरतापूर्ण तैयारी से जुड़ जाये। यहां विशेष उल्लेखनीय सुझाव यह है कि प्रायोगिक विषयों की तैयारी में अंतराल तभी लें जब बनाया जा रहा गणित अथवा एकाउंट का प्रश्न हल हो चुका हो। अधुरे प्रश्न को बाद में पूरा कर लेने की सोच फिर से उतना ही समय बर्बाद कर सकती है। छोटे मोटे जोड़ घटाव वाले प्रश्नों पर आने वाली दिक्कतों का सामना करने के लिये मन में जोड़ घटाव खाली समय में करते रहना चाहिये। इस मामले में पजल्स खेल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है, जैसे रंगों को सेट करने वाला चौकोर दिमागी खेल।
कुछ अति महत्वपूर्ण बिंदुओं पर रखे ध्यान
परीक्षा की तैयारी के लिये कुछ अति महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान रखना जरूरी है। संक्षिप्त वे कुछ इस प्रकार हो सकते है।
1. टाईम टेबल के अनुसार करें पढ़ाई।
2. कठिन लगने वाले विषयों को बहुत सबेरे के शांत वातावरण में पढ़े।
3. जहां पढ़ाई कर रहे हों उस कमरे का वातावरण शुध्दता से पूर्ण हो।
4. पढ़ाई के लिये बैठने से पूर्व हल्का और सुपाच्य भोजन अवश्य लें।
5. गणितीय विषयों के सूत्रों का चार्ट टेबल के सम्मुख लगाकर रखें।
6. मन को भ्रमित करने वाले प्रश्नों को अलग निकालकर शिक्षकों से मार्गदर्शन लें।
7. सैध्दांतिक प्रश्नों का उत्तर लिखते समय मूल्यांकनकर्ता को जीतने विशेष रूप से बिंदुओं को रेखांकित अवश्य करें।
8. प्रश्न के उत्तरों को बिंदुवार याद कर बार-बार लिखें। जिससे आत्मबल बढ़ेगा।
9. परीक्षा कक्ष में प्रवेश करते समय नकारात्मक विचारों का त्याग करें और जिन प्रश्नों को नहीं पढ़ा गया है उनके बारे में बिल्कुल न सोंचे।
10. आपके द्वारा पढ़े गये प्रश्नों का उत्तर आसानी से लिखा जा सकता है, इस विचार के साथ अपने रोल नंबर वाली जगह पर बैठे।
11. मन को विचलित करने वाली बातें करने वाले दोस्तों से दूर रहे, हो सके तो परीक्षा तक उनसे संबंध न रखें।
ध्यान रखें न हो ये गलतियां
विशेषकर कॉमर्स संकाय के विद्यार्थी एकाउंटेंसी का प्रश्न हल करते समय इन छोटी छोटी बातों का विशेष ध्यान रखें। साझेदारी से लेकर गैर व्यापारिक संस्थाओं और अवक्षयण अथवा मूल्य ह्ास के प्रश्नों को जल्दबाजी में हल न करें। अवक्षयण के प्रश्न पर दी गयी विधि के साथ मूल्य ह्ास की दर एवं प्रतिवर्ष शब्द का महत्व ध्यान में रखें। यह भी ध्यान में रखें कि इस शब्द का महत्व घटती किश्त पध्दति में महत्वपूर्ण है, जबकि स्थायी किश्त पध्दति में इसे सर्वथा दिया जाना माना जाता है। इसी तरह गैर व्यापारिक संस्थाओं की प्रारंभिक पूंजी ज्ञात करते समय प्रारंभिक संपत्ति और प्रारंभिक देयताओं की जानकारी जरूरी है। अत: विद्यार्थी उदाहरण के प्रश्नों को छोटा मानकर उसे नजर अंदाज न करें। साझेदारी अध्याय इस मामले में कुछ पेचीदा हो सकता है। कारण यह कि यह पूरे विषय के लगभग 40 प्रतिशत पाठयक्रम के बराबर है। सामान्य साझेदारी से लेकर नये साझेदार का प्रवेश, उसका अवकाश ग्रहण और संस्था के समापन पर ख्याति का मूल्यांकन विशेष गणितीय भाग से जुड़ा हुआ है। मूल्यांकन से लेकर ख्याति के अपलेखन तक विधियों को दिमाग में बैठाने छोटे-छोटे दिये गये उदाहरणों को अवश्य हल करें। साथ ही इन सारी परिस्थितियों में लाभ विभाजन के अनुपात में आने वाला परिवर्तन भी अलग अलग विधियों के कारण विद्यार्थी जगत को परेशान करता आ रहा है। इन्हें सही ढंग से समझने में शिक्षक की भूमिका की अनदेखी न की जाये। कक्षा में शिक्षक द्वारा समझाये जाने पर उचित ध्यान और फिर प्रश्नोत्तर खंड में दिये ऐसे प्रश्नों का अभ्यास नितांत जरूरी समझा जाना चाहिये।
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