पानी में बढ़ता प्रदूषण



संरक्षण व स्वच्छता पर दिया जाए ध्यान 
कहते हैं कि यदि तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो वह पानी के लिए होगा। पता नहीं इस कथन में कितना सच है, लेकिन यह सत्य ही है कि स्वच्छ पानी की समस्या दुनिया भर में छाई हुई है। हमारी यह दुनिया दो-तिहाई पानी से घिरी हुई है। समुद्री पानी खारा जरूर है, लेकिन प्रकृति इसे मीठा करके वर्षा के रूप में हमें लगातार प्रदान करती है। यह सच है कि मानसून कहीं ज्यादा, कहीं कम बरसता है, लेकिन प्रकृति ने विभिन्न व्यवस्थाओं के माध्यम से हम सबको किसी न किसी रूप से जल उपलब्ध करवाया है।
हिमालय में ग्लेशियर के पिघलने से नदियों से जल हमें मिलता है; जबकि अन्य जगहों में बरसाती नदियों से, कुएं-तालाबों व अन्य भू-जलस्त्रोतों के रूप में हमेशा कहीं न कहीं पानी हमारे बीच रहता है। यह हमारी ही कमी व कुप्रबंधन है कि हम इसे संभाल नहीं पाते, इसमें प्रकृति का जरा भी दोष नहीं है। पानी एक ऐसा कुदरती संसाधन है, जो कहीं भी घट नहीं रहा है, समयानुसार उसमें कमी या बढ़ोत्तरी जरूर हो जाती है।
ऐसा अनुमान है कि पूरी दुनिया 96 प्रतिशत से अधिक पानी महासागरों और समुद्रों में है। केवल 2.5 प्रतिशत बरफ के रूप में है और केवल 0.5 प्रतिशत हमें उपयोग के लिए मिलता है। इस 0.5 प्रतिशत जल का वितरण भी पूरी दुनिया के विभिन्न भागों में एक समान नहीं है। इसका अधिकांश भाग अमेरिका और कनाडा सीमावर्ती झीलों में गिरता है और प्राप्त पानी का सबसे बड़ा हिस्सा कनाडा में मिलता है। पानी के इस विषम वितरण के कारण ही पानी की अनेक तरह की समस्याएं हैं।
पानी को लेकर कुछ देशों के बीच तनाव भी बढ़े हैं। दूर क्यों जाएं, अपने ही देश में भावनगर और राजकोट में पानी के लिए दंगे होने की खबरें हम सुन चुके हैं। लगातार बढ़ती हुई जनसंख्या औद्योगीकरण के साथ नगरीकरण ने इस समस्या को और भी विषम बना दिया है। हमारे देश की ज्यादातर नदियों अब इतनी ज्यादा प्रदूषित हो चुकी हैं कि उनका पानी-पीने योग्य नहीं रह गया है। पानी में बढ़ता प्रदूषण ने उनमें रहने वाले जलचर प्राणियों को भी समाप्त कर दिया है।
हमारे देश में ज्यादातर जरूरतों के लिए हम जमीन के नीचे से प्राप्त होने वाले जल पर निर्भर होते जा रहे हैं, जिससे भू-जल का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है और कई कुएं सूख गए हैं। कृषि में उवरकों व कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से कुछ जगहों में भूजल के भी खारे या विषैला होने की खबरंे आई हैं।
दुनिया भर में पानी को बचाने के लिए तीन आर्स-रिड्यूस, रिसाइकिल और रियूज का फार्मूला दिया जाता है। रिड्यूस यानी हम पानी का कम इस्तेमाल करें, उसकी यथासंभव बचत करें। इस्तेमाल किए जा चुके पानी को रिसाइकिल करें अर्थात उपयोग में लाए गए पानी को पुन: प्रयोग करने के लिए जरूरी प्रक्रियाओं से गुजरें और रियूज यानी उपयोग किए जा चुके पानी से शुद्धिकरण के बाद इस पानी का दोबारा इस्तेमाल करें।
हर साल वर्षा से हमें भारी मात्रा में जल उपलब्ध होता है, इसकी मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि नदियों में बाढ़ आ जाती है, पानी के कारण तबाही फैल जाती है और वर्षा ऋतु के जाने के बाद सरदी व गरमी के मौसम में पुन: पानी की कमी हो जाती है। नदियां सूख जाती हैं,  कुओं-तालाबों आदि में पानी का स्तर बहुत नीचे चला जाता है और फिर पानी की किल्लतें बढ़ जाती हैं। यह सब होता है- हमारी अदूरदर्शिता व पानी के कुप्रबंधन की वजह से।
यदि वर्षा ऋतु में ही पानी के संरक्षण व इसके उपयोग की विधियां तलाश ली जाएं, तो साल भर के लिए आसानी से पानी की समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है। वर्षा का पानी, जो नदियों-नालों में उफान की तरह आता है और बह-बहकर या तो सूख जाता है या फिर समुद्र की गोद में समा जाता है, उसे रोकने व उसका उपयोग करने की तरकीबें हमारी पानी की समस्याओं का सबसे बेहतर उपाय है और ऐसा न कर पाना ही हम सब की पानी की समस्या को बढ़ाने का मुख्य कारण है।
हमारा देश कृषि प्रधान देश है। यहां खेती करने के लिए, साग-सब्जिीयां आदि उगाने के लिए पानी की बहुत बड़ी मात्रा प्रयोग की जाती है। खेती करने वाले ज्यादातर किसान पानी के लिए वर्षा पर निर्भर रहते हैं, वर्षा न होने पर या तो किसान निराश हो जाते हंै या फिर अपने आस-पास उपलब्ध नदियों-तालाबों या भूमिगत जल का प्रयोग करते हैं। ऐसा करने से भू-जल का स्तर लगातार नीचे उतरता जाता है। और गरमी का मौसम आने तक यह स्तर अत्यंत न्यून हो जाता है। कहीं-कहीं पर भू-जल सूख भी जाता है; क्योंकि इस जल की एक सीमा है, इसे प्रकृति अपनी प्राकृतिक शोधन-प्रक्रियाओं के तहत संरक्षित करती है। यह जल शुद्ध-मीठा होता है, लेकिन इसका अवांछित उपयोग पानी के संकट को बढ़ाता है।
आज स्थिति यह है कि कभी गांवों-कस्बों में जो नदियां-नाले बहते थे, तालाब-नदियां पानी से भरे रहते थे, वे सब आज या तो सूख गए हैं या फिर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते दीख रहे हैं। नदियां अत्यंत प्रदूषित हो गई है और यहीं कारण है कि समाज व सरकार, दोनों ही इनका अस्तित्व बचाने के लिए इन्हें स्वच्छ करने के लिए अभियान चला रहे हैं, प्रयासरत हैं। पता नहीं इसमें कब और कितनी सफलता मिलेगी, लेकिन सच में नदियों के स्वच्छ होने से न केवल हमारी पानी की समस्याएं दूर होंगी, बल्कि हमारी सभ्यता-संस्कृति भी पोषित होगी।
लोग पानी का महत्व नहीं समझते, इसे यो ही बरबाद करते करते रहते हैं। शायद इसलिए; क्योंकि इसे प्रकृति से प्राप्त करने में हमें कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती, लेकिन पानी के गहराते संकट के कारण इसकी कीमत दुनिया को विभिन्न परेशानियों के रूप में चुकानी पड़ रही है। इसका प्रमाण है कि अमेरिका के लॉस एन्जिल्स में एक रेस्तरां के बाहर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए लिखा गया है- दक्षितण कैलिफोर्निया में आने वाले प्यासे यात्रियों, आपका स्वागत है। यहां आपको पांच वर्ष पुराना टॉयलेट वॉटर मिलेगा।
टॉयलेट यानी शौचालय का पानी और वह भी पीने के लिए! पर यह सच है। इसे वहां पर लोग ईस्ट वैली वाटर रिक्लेमेशन परियोजना ने संभव बनाया है। इस परियोजना में सीवर के पानी को पीने लायक बनाया जाता है। इस शोधन-प्रक्रिया में पांच वर्ष का समय लगता है। इसके पहले तक इस इलाके के लोागें को कनाडा से पानी आयात करना पड़ता था। कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में दुनिया के सभी देशों को ऐसे ही तरीकों पर निर्भर होना पड़े, जिसमें किसी भी तरह के जल को शुद्ध करने उसे पीने की परंपरा जुड़ जाए।
अत: हम सभी को पानी के महत्व को समझना होगा, इसके संरक्षण व महत्व को अन्य लोगों को भी समझाना होगा।

टिप्पणियाँ