दीपावली, लक्ष्मीपति और भूमण्डलीकरण



आज के युग में दीपावली पर यदि विचार करना हो तो मुख्य और तात्विक प्रश्न यह होगा कि आज  हमारे लिए यह कितनी सार्थक, समीचीन और हमें आगे ले जाने वाली है। जब भूमंडलीकरण के युग में हम दीपावली का त्यौहार मनायेंगे तो मुख्य लक्ष्य भी यही होगा कि हमारे जीवन में यह कितनी खुशियां, उत्साह और आनन्दबोध लाने वाली है। आज के युग के सभी लोगों की खुशियां भी समान नहीं हो सकतीं। यदि खुशियों को हम आनन्दबोध मान लें तो यह विभिन्न व्यक्तियों की भिन्न-भिन्न हैं और व्यक्तियों के आधार पर जो सामाजिक रचना हुई है, उसमें जो समुदाय जन्मे हैं वे भी स्वार्थों से मुक्त नहीं हैं और सभी स्वार्थ एक-दूसरे के सहयोग पर आधारित नहीं हैं। जब समाज में शोषण की प्रवृत्ति पनपती है तो वह वैयक्तिक व पारिवारिक लाभ पर आधारित होती है। यह न मानते हुए भी कि वह स्थायी नहीं हो सकती क्योंकि मनुष्य को अमरत्व प्राप्त नहीं है।

 समाज और परिवार नाम की जो संस्थाएं बनी हैं वे भी निरंतर परिवर्तनशील हैं। यही कारण है कि यह उनके जीवन, विचार दर्शन, स्वभाव, मान्यताओं में भी देखी जा सकती है। क्या हम सुखों को वैयक्तिक कल्पना तक ही सीमित कर सकते हैं, नहीं। हमारे जीवन का अस्तित्व ही सहमेल पर आधारित है और जीवन में जैविक आवश्यकताएं भी विद्यमान हैं जो व्यक्ति के आने के बाद ही समाज संचालन में सहायक होती हैं। इसी प्रकार सुख और आनन्द के निर्णायक स्रोत की खोज करनी हो तो जब सुख एक नहीं है  तो उसका आनन्द विवादित होगा ही। उनके स्वरूप, दिशा और प्रयत्न में भी एकरूपता नहीं होगी, फिर जिसे हम समाज कहते हैं उसकी संयोजक शक्ति का आधार किसे मानेंगे और उसे संजोने के लिए हमारे प्रयत्न क्या-क्या होंगे। इस प्रश्न पर पहले भी विचार होता रहा है और आज भी जारी है। 

समाज व्यवस्थाओं को स्वीकारते, नकारते परिवर्तन करके आज हम जहां पहुंचे हैं, उसे लोकतंत्र यानी समान विचारों के सहमेल को निर्णायक के रूप में स्वीकार करने लगे हैं। विश्व में जो परिवर्तन हो रहे हैं उनमें भी यह प्रवृत्ति अन्य प्राचीन व्यवस्थाओं की अपेक्षा स्वीकार्य होती जा रही है। कठिनाई यही है कि हमारी आस्था, विश्वास, मान्यताओं में जिस प्रकार विविधता और बिखराव है उसको मानते हुए सहमति के आधार बिन्दुओं की खोज की जाए क्योंकि इसमें सर्वसहमति नहीं हो सकती। इसलिए हमने वर्गों के सिध्दान्त को स्वीकार किया है और असहमति को इसका गुण माना है। इसीलिए जाति, धर्म, सम्प्रदाय, वंश, कुल, लिंग आदि के निर्णायक रूप को अस्वीकार किया है लेकिन इनका अस्तित्व तो है ही और इनकी प्रकृतियों से निकल कर हम समाज में अधिकतम स्वीकृति का कारण बन सके लेकिन जिनको ऐसी व्यवस्था से असहमति भी है, उनकी सीमाएं  हम कहां तक स्वीकार करेंगे, यह निर्णय तो उन्हीं का होगा जो व्यवस्था के संयोजक बन गये हैं। पहले राय नामक व्यवस्था को भी इसीलिए स्वीकार किया गया था जिससे शक्ति के बल पर होने वाले परिवर्तनों को रोक सकें। इसीलिए राय नामक संस्था को हमने अपरिमित अधिकार सौंपे। दूसरी ओर शास्त्रकारों ने भी राय को बड़ा पवित्र नहीं माना बल्कि इसे निरंकुश शक्ति के प्रतीक के रूप में ही देखा क्योंकि उसकी शक्ति का मुकाबला समाज में करने की क्षमता किसी में नहीं दिख रही थी।

बात दीपावली की हो रही थी। माना यही जाता है कि यह लक्ष्मी का त्योहार है। इस प्रकार लक्ष्मी पूजा इसका प्रमुख गुण और आवश्यकता है लेकिन लक्ष्मी स्वतंत्र नहीं हैं, इसलिए लक्ष्मी पति ही उनके निर्णायक और वाहक हैं। सरस्वती एवं दुर्गा जिन दो  और शक्तियों की कल्पना की गई है उनमें एक को संहारक और दूसरे को ज्ञान के वाहक के रूप में माना गया है लेकिन यह दोनों स्वतंत्र कैसे हों यह प्रश्न मुख्य है। दुर्गा सर्वशक्तिमान होकर भी भावी व्यवस्था के प्रश्न से मुक्त नहीं हो सकतीं। इसके लिए वे स्वयं संसार का संचालक बनने का उपम करती हैं। इसी प्रकार सरस्वती ज्ञान की प्रतीक हैं लेकिन मुख्य प्रश्न तो यह होगा कि उसकी स्थापना के लिए अनुकूल वातावरण और सृष्टि की भी आवश्यकता होगी। फिर निर्णायक शक्ति की खोज बची ही रह जायेगी क्योंकि इसे स्वत: उद्भूत मानकर भी समाधान संभव नहीं है क्योंकि वह तत्व और उस पर नियंत्रण भी होने चाहिए जिससे वह अपनी आत्मरक्षा और विस्तार कर सकें। 

आज जब हम भूमंडलीकरण को स्वीकार कर नये समाज की ओर उद्भूत हैं तो उसमें लक्ष्मी निर्णायक बन गई हैं लेकिन उनका स्वरूप, उनकी पहचान हमको दो रूपों में दिखायी गयी है जिन्हें हम 'शुभ और लाभ' कहते हैं। क्या सभी के लिए यह एक जैसा हो सकता है और क्या लाभ भी शोषण से परे अन्य कोई ऐसी व्यवस्था है जो सभी के लिए हितकारी हो। यह स्वीकार्यता तो विभिन्न कारणों से हो नहीं सकती इसलिए लक्ष्मी के वाहन को 'उलूक' बताकर सभी के लिए सम्माननीय नहीं बताया गया है। जब कठिनाइयों का जि होगा तो सबसे पहला प्रश्न होगा कि क्या हम जिस नये युग की सृष्टि, सम्मान, स्वीकृति और विस्तार कर रहे हैं उसके आदर्श 'गुण और मूल्य' भी होंगे या नहीं। इन्हें शाश्वत न भी माना जाए तो समाज किस प्रकार का बनाएं, उसके आदर्श और मान्यताएं तो होंगी ही। इन आदर्श और मान्यताओं का जन्म भी उसी व्यवस्था से ही होगा। इस प्रकार यह भूमंडलीकरण वास्तव में विश्वबन्धुत्व का परिचायक नहीं, बल्कि पूंजी को निर्णायक तत्व मानकर उसकी स्थापना करना ही है। इसीलिए तो हमारी खुशियां, उत्साह और उसके तेवर भी कैसे बन और बिगड़ रहे हैं, इनके दर्शन करने हों तो किसी क्षेत्र में इसे ही सफलता मानेंगे। वैचारिक रूप से जिन आदर्शों, मर्यादाओं की सराहना करते हैं वह पूंजी या लक्ष्मी पर आधारित नहीं।

वृत्ति व्यवसाय आजीविका को तो मानेंगे, लेकिन इसकी असंगत वृध्दि को नहीं लेकिन जब हमारी खुशियों के आकलन के लिए शेयर बाजार ही प्रमुख होंगे तो हमें यह भी याद आयेगा कि वह शोषण पर आधारित व्यवस्था को ही मजबूत करने वाले हैं। फिर जिसे हम अभिव्यक्ति मानते हैं वह कितनी व्यवसायपरक है, उसी को ही अन्तिम स्वरूप मानने का प्रश्न जब आयेगा तो वह आदर्शशीलता और गुणों से परे ही दिखाई देगी। ऐसी स्थिति में यह लक्ष्मी का त्यौहार लक्ष्मीपतियों के उत्साह का कारण तो है लेकिन हम भी खुशियां चाहते हैं इसलिए हम भी इसके मनाने की परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं और यह परंपरा लक्ष्मीपति को ही मजबूत करने का कारण बनेगी। हम यह स्वीकार कर लेंगे कि लक्ष्मी जो कुछ भी करेंगी वह जिसकी वह वाहक हैं उसकी इच्छा और स्वार्थों के विपरीत नहीं होगा।  इस प्रकार हम लोकतंत्र में घर-घर दीप जलाने वाली दीपावली उनके लिए कितने प्रकाश और उत्साह का वाहक बनी, इसका मूल्यांकन दीपावली पर्व मनाने के बाद करेंगे तो क्या यह हमारे आत्मतोष का कारण बनेगा। समाज में पूंजी को निर्णायक के रूप में स्वीकारना उसके मुट्ठी भर वाहकों को निरंकुश अधिकार और छूट देने जैसा होगा। फिर हमारी खुशियां भी उन्हीं द्वारा प्रदत्त होंगी जो उनके स्वार्थों से पूर्ण मुक्त नहीं हो सकतीं।

टिप्पणियाँ