वृक्षारोपण व कृषि का वास्तु-सिध्दांत
हम जानते हैं हर फसल का अपना एक निश्चित मौसम होता है। जाड़े की फसल गर्मी में नहीं होती है और गर्मी की फसल जाड़े में नहीं होती है।
हवा, सूर्य का प्रकाश, धरती, बीज वही रहते हैं पर फसल नहीं उगती। वातावरण और भूमि की स्थिति, उसकी किस्म का प्रभाव फसल पर पड़ता है। भारतीय वास्तु शास्त्र के अनुसार भूमिखंड व उसकी दिशाओं आदि का प्रभाव भी कृषि पर पड़ता है। किसी भूखंड के आग्ेय कोण पर लगाया गया नारियल का वृक्ष सूख जायेगा। नारियल के वृक्ष को आग्ेय कोण में लगा देने से वह सूख जायेगा, फल नहीं देगा, फलों की उत्पत्ति होगी भी तो उनके गुणों पर प्रभाव पड़ेगा, ठंडापन कम हो जायेगा, फल का आकार छोटा हो जायेगा। नारियल एक जलीय वनस्पति है यह ईशान कोण में ही उचित रूप से फलेगा और फूलेगा और उसकी गुणवत्ता भी उत्तम प्रकृति की होगी।
मिट्टी भूमि और फसल
आधुनिक विज्ञान की खोज भूमि, मिट्टी एवं फसलों के बारे में आधुनिक विज्ञान के अंतर्गत कई तरह के खोज किए गए हैं। लेकिन उनका प्रयोग लाभदायक है या हानिकारक, ये ज्ञान हमारे किसान भाईयों के मस्तिक में है। भले ही वे वास्तु सूत्रों या सिध्दांतों के बारे में कुछ भी ज्ञान न रखते हों, यह उनका अपना व्यावहारिक अनुभव है जो मिट्टी एवं उसकी प्रकृति व गुणों से संबंधित है। अत: इस अनुभव को वास्तुसम्मत ही समझें। वैसे वास्तु का प्राचीन वर्गीकरण निम्लिखित है:
ब्राह्मणी मिट्टी:- सभी प्रकार के सात्विक गुणों वाली वनस्पति अन्न कंद या मूल के लिये ब्राह्मणी मिट्टी उपयुक्त है। सात्विक अन्न, वनस्पति, कंदमूल इत्यादि वे हैं, जिन्हें खाने से मन मस्तिष्क एवं ह्रदय को शांति व शक्ति मिलती है।
क्षेत्रीय मिट्टी:-ऐसे अन्न या वनस्पति इत्यादि जो स्फूर्ति, ऊर्जा, क्रियाशीलता उत्पन्न करते हैं। क्षेत्रीय मिट्टी उत्तम परिणाम एवं गुणों को उत्पन्न करते हैं।
वैश्या मिट्टी:- ऐसे अन्न, कंद, मूल एवं वनस्पति जो चर्बी बढ़ाते हैं और शरीर में स्थूलता, मन में आलस्य करते हैं, वैश्या मिट्टी में अधिक जीवन शक्ति और गुणवत्ता से उन्नति करते हैं।
शुद्र मिट्टी:- जिन वनस्पतियों से कड़वाहट, अत्यधिक गर्मी, प्रमाद, मादकता, जड़ता उन्नति होती है।
फसलों का दिशाओं हेतु चुनाव
नैर्ऋत्य कोण में: भारी बड़े फल या दाने वाले, गूढ़ बलदायक गुण वाले।
वायव्य कोण में : लंबे कद, लंबाकार दानों, या फलों, पतले तने वाले वायवीय गुणों वाले अनाज और फल।
आग्ने कोण में: गर्म, तीखे कम जल वाले तीक्ष्ण, कटु जठरागि् को प्रदीप्त करने वाले मिर्च,अदरक आदि।
ईशान कोण में: जलीय गुणों वाले रसदार फल आदि।
अनुकूल मौसम
अक्सर देखा गया है कि फसल में गुण मौसम के प्रतिकूल होते हैं। इसका मतलब यह है कि गर्म मौसम में ठंडे और ठंडे मौसम में गर्म गुण वाली फसल होती है। इसका कारण यह है कि पृथ्वी एक जीव है,बाहरी तापक्रम या वातावरण के परिवर्तन के फलस्वरूप उसमें प्रतिरोधी शक्तियां कार्य करने लगती हैं और सतह पर विकसित होने वाली ऊर्जा मौसम की प्रतिरोधी होती है। वैसे भी जाड़े में इसकी नामिक की क्रिया तेज होती है और इसमें से ऊर्जा का विकिरण अधिक होता है। गर्मी में इसका ठीक उल्टा होता है। समुद्र के किनारें बड़ी नदियों के तट पर बरसात के मौसम में जलीय गुणों से युक्त पौधे, फल या वनस्पति उत्पन्न होते हैं। पठार, शुष्क प्रदेश, कम ऊर्जावाले क्षेत्रों में जलीय तत्व नहीं होते हैं। जहां वर्षा अधिक होती है, जलस्रोत का प्रभाव होता है, समुद्री किनारा होता है या भूमि की ही स्थिति उस क्षेत्र में जलीय होती है।
विशेष : बांस, बेंत, घास इत्यादि ऐसी वनस्पतियां जिनमें आग लग सकती है आगेय कोण में लगायें। इसे वायव्य कोण में कभी न लगायं।े हवा का झोंका रगड़ उत्पन्न कर अगि् पैदा कर सकता है।
कैले जलीय तने वाले वृक्ष एवं धान जैसे पौधे ऐसी भूमि पर लगायें जो फलीय हों।
जिस भूमि में तीन फुट नीचे बालू की अधिक मात्रा हो वहां वृक्ष न लगायें ऐसी कोई फसल न उगायें जिसकी जडें ग़हरी हों नहीं तो फसल सूखेगी।
जिस भूमि के नीचे 3 इंच के बाद पानी हो या बालू हो, वहां भी बड़े वृक्ष न लगायें। यहां केला तो लगाया जा सकता है पर कटहल, आम, लीची एक निश्चित अवधि के बाद सूख जायेंगे।
एक विचित्र अज्ञानता सरकारी वृक्षारोपण में देखी गई है। बीच में सागवान या कीमती वृक्ष का पौधा लगाकर उसके चारों ओर बबूल के पेड़ लगा देते हैं सुरक्षा के लिये यह उपाय नायाब है। मगर यह किसी की समझ में नहीं आता कि बबूल की जड़ की गर्मी वह बेचारा नन्हा पौधा कैसे सह पायेगा? मृत हो जायेगा
जलस्रोत
सिंचाई के लिये जल नलकूप ईशान कोण में लगवाना चाहिए। लोहे के पाइप उत्तम होते हैं। यदि मोटर पम्प यहां कोई चैकोर या वृताकार गङ्ढा बनाकर लगाया जाये वो बेहतर है। इसके लिये बनाये गए कक्ष के शेड में बिजली के बोर्ड आदि आगेय कोण में लगायें। पम्प सैट प्रयोग कर रहे हाें तो इसे नैर्ऋत्य कोण में लगाये।
जुताई या रोपण का समय
खेत की जुताई ईशान कोण से शुरू करें और नैर्ऋत्य कोण पर खत्म करें। रोपण कार्य में इस सूत्र का प्रयोग करें।
कृषि वास्तु हेतु विशेष निर्देशन
यदि नर्सरी का व्यापार करना हो तो यह खेत में पूर्व या पश्चिमी भाग में लगाना चाहिए।
यदि भेड़ बकरियों का पालन करना हो तो घर दक्षिण या पश्चिम की ओर हो। पोल्ट्री फार्म का व्यापार पश्चिम दिशा की ओर हो।
तालाब बनाकर मछली पालन उद्योग लगाना हो तो यह केवल आधे खेत पूर्वउत्तर दिशा में किया जाना चाहिए।
सूर्यास्त के पश्चात् खेती से संबंधित कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए और न जानवरों को काम में लगाना चाहिए।
यदि नदी नाला अथवा नहर दक्षिण दिशा की ओर है तो आर्थिक हानि अवश्य होगी। यदि खेत का कोई हिस्सा विक्रय करना है तो दक्षिण या पश्चिम दिशा की ओर वाला भाग विक्रय कर देना चाहिए। भू भाग की चारदीवारी बनाना संभव न होता हो तो इन स्थानों पर ऊंचे वृक्ष लगा देने चाहिए। उपलों का ढेर आगेय कोण में रखें।
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